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के0 आसिफ़ का मुगल ए आज़म

      आज से ठीक 60 साल पहले 5 अगस्त सन 1960 को एक फ़िल्म रिलीज हुई, रिलीज के लिए मुम्बई के प्रसिद्ध मराठा मंदिर थियेटर को दुल्हन की तरह सजाया गया, टिकटों पर पहली बार फ़िल्म के पोस्टर छापे गए, देखते ही देखते पूरे देश के सिनेमाघरों में दर्शकों की लम्बी लम्बी कतारे लग गयी, पड़ोसी देश पाकिस्तान के भी सिनेमाघर हाउसफुल हो गए, टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग होने लगी, वह कोई और फिल्म नहीं भारतीय सिनेमा के सबसे महानतम फिल्मों में से एक के0 आसिफ निर्देशित मुग़ल-ए-आज़म फिल्म थी।      लोकप्रिय नाटककार "इम्तियाज अली ताज" के प्रसिद्ध नाटक "अनारकली" की पृष्ठभूमि पर "के0 आसिफ" की उपज "मुगल-ए-आजम" फ़िल्म किसी प्रसिद्धि की मोहताज नही है, मुग़ल-ए-आज़म वह कालजयी फिल्म है जिस के बनने की कहानी मात्र पर कई फिल्में बनाई जा सकती हैं और कई किताबें लिखी जा सकती हैं। ऐसा हुआ भी है, इस फिल्म के 60 साल बीत जाने के बाद भी राजकुमार केसवानी नाम के वरिष्ठ पत्रकार व लेखक का किताब "दास्तान ए मुग़ल-ए-आज़म" लिखना इसका जीवंत उदाहरण है। इस फिल्म को महान बनाने में जिसका सर्वाधिक योगद...

नारी अबला नही है...बैंडिट क्वीन

      आज एक ऐसी नारी की पुण्यतिथि है, जिसने समाज को बता दिया था की नारी अबला नही है, जी हम बात कर रहे है "बैंडिट क्वीन" फूलन देवी की... फूलन देवी की बायोग्राफी पुस्तक "मैं फूलन देवी" के अनुसार फूलन देवी का विवाह एक तिगुने उम्र के आदमी के साथ महज 11 के उम्र में कर दिया गया था, पति के प्रताड़ना से आजिज फूलन देवी अपने घर भाग आयी और कुछ नए दोस्त बनाये जो डाकू थे, फूलन ने अपनी किताब में इन्हें "किस्मत की मर्जी" कहा है, डाकुओ को फूलन पर प्यार आ गया, वर्चस्व की लड़ाई के दौरान डाकू बाबू गुज्जर मारा गया, इसी के इंतकाम में फूलन के साथ 22 लोंगो ने बलात्कार किया, जिसने फूलन की जिंदगी में तूफान ला दिया और फूलन देवी को डाकू बनने पर मजबूर कर दिया।         अपनी ताकत बढ़ाने के बाद सन 1981 में डाकू फूलन देवी ने भीमई गांव पहुंचकर 22 बलात्कारियों को घर से बाहर निकाल कर गोली मार दी, इंदिरा गांधी के फांसी न देने के वादे के बाद फूलन देवी ने सन 1983 में सरेंडर कर दिया। 22 हत्या, 30 डकैती, 18 अपहरण की आरोपी फूलन देवी 11 साल जेल में रही, उसके बाद सन् 1994 में जेल से छूटने के...

आरक्षण और वंचित समाज

   देश में जारी आरक्षण पर बहस के इस दौर में मैं आरक्षण विरोधियों से केवल इतना पूछना चाहता हूं कि इतने दिनों तक आरक्षण रहने के बावजूद भी शोषित, वंचित जातियों को आज तक उनका वाजिब प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिल पाया?? क्या कारण है कि राजा राममोहन राय के बाद आज तक किसी सवर्ण ने वंचितों और पिछड़ों के हितों की आवाज को नहीं उठाया?? आज जातिगत आरक्षण की बजाए गरीबी के आधार पर आरक्षण की मांग की जा रही है आखिर ऐसा क्यों?? जबकि सबको मालूम होना चाहिए कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का आधार नहीं है, आरक्षण शोषितों, वंचितों व पिछड़ों को समान प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए लागू किया गया था क्योंकि सामाजिक विसंगतियों की वजह से बहुत सी जातियां समाज में आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक रूप से बहुत ही पिछड़ गई थी। एक सशक्त लोकतंत्र की नींव वहां के सभी वर्गों के आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक न्याय पर टिकी होती है।     हमारे देश की 85 प्रतिशत वंचित व पिछड़ी जातियों के पास देश की सरकारी नौकरियां में 20 परसेंट की भी हिस्सेदारी नहीं है, संविधान के लागू होने के लगभग 70 वर्षों बाद भी सरकारों ने इन जातियों के उत्थान ...

न्यायपालिका में परिवारवाद

(5 मिनट समय निकालकर जरूर पढ़ें)    जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं कि हमारे देश में एक स्वतंत्र न्यायपालिका है, जिसकी व्यवस्था संविधान ने की है. परंतु क्या इसको एक स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका कहा जा सकता है, यह हमेशा से एक सवाल रहा है. जनसत्ता में छपी खबर के मुताबिक हाल ही में मुंबई के एक वकील मैथ्यूज जे नेदुमपारा ने National judicial appointment act को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की है, उन्होंने अपनी यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संवैधानिक पीठ को सौंपी है, नेदुमपारा ने कहा है कि कॉलेजियम व्यवस्था जिसमे एक जज दूसरे जज को नियुक्त करते हैं न्याय संगत नहीं है।   विदित हो कि 1990 के कुछ फैसलों से कॉलेजियम सिस्टम बना था. नेदुमपारा का दावा है कि उनका रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट व 13 हाईकोर्ट के 2014 तक के आंकड़ों पर आधारित है, उनका आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट बिना कोई भर्ती नोटिफिकेशन के ही जजों की नियुक्ति करता है जिसमें किसी जज, वकील या न्यायपालिका से जुड़े परिवार के व्यक्ति को ही तरजीह दी जाती है. मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट के 31 जजों में 6 जज पूर्व जजों के बे...

अतीत

   अतीत    फरवरी का पहला सप्ताह...मेरे एक मित्र को एक ग्रीटिंग कार्ड की जरूरत थी शायद कोई खास छूट गया था, छोटे से कस्बे में बमुश्किल 5 या 6 दुकानों वाली बाजार में कही ग्रीटिंग कार्ड मिल नही रहा था सब कार्ड जनवरी तक खत्म हो चुके थे, मुश्किल से एक दुकान पर बचे कुछ कार्डों मे से एक कार्ड जो पसंद भी नही था लेना पड़ा मैं खरीदते वक्त अपने मित्र के साथ था मैंने पूछा इतनी क्या जरूरत है तो उसने कहा कि अगर नही मिलता तो बाहर से किसी भी तरह एक कार्ड मांगना पड़ता चलो मिल गया, बात एक कार्ड की नही है उस भावात्मक दोस्त की है जो एक कार्ड न पाने की वजह से नाराज हो गया था जो आज के मशीनी दौर में शायद देखने को मिले, आज मोबाइल का युग है हमने एसएमएस का दौर भी देखा है जो बहुत कम समय मे खत्म हो गया अब शायद ही कोई एसएमएस भेजता हो, ये केवल बैंकिंग व अन्य सूचनाओ तक ही सीमित रह गया है।    आज के स्मार्टफोन के दौर में मैंने नए साल की पहली सुबह को जब मोबाईल खोला तो मोबाइल पर शुभकामनाओ की बाढ़ सी आ गयी, कई संदेश सालो बात मिले शायद अगली न्यू ईयर के बाद इस बार भी न्यू ईयर पर ही आये थे, मैसेज कि...

अयोध्या विवाद और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

   कल दिनांक 9 नवंबर 2019 को देश की सर्वोच्च अदालत ने लगभग 400 वर्षों से अधिक समय तक विवादित रहे राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में अपना फैसला सुनाते हुए यह आदेश दिया कि विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए दी जाए व अयोध्या में 5 एकड़ जमीन मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए दी जाए इसी के साथ इस बहुत पुराने धार्मिक व ऐतिहासिक मुद्दे का लगभग-लगभग अंत हो गया। इससे पहले इस धार्मिक मुद्दे को लेकर हिंदू और मुस्लिमों के द्वारा राम और बाबर के नाम पर जो खूनी होली खेली गई थी उसको इतिहास कभी माफ नहीं करेगा, आखिर धर्म के नाम पर हिंसक होना व धर्म के लिए खून बहाना कहां तक किसी धर्म में जायज है जबकि सारे धर्म यही दावे कर रहे हैं की उनका धर्म शांति व मानवता का संदेश देता हैं लेकिन अयोध्या विवाद पर जो त्रासदी भारत में हुई उसे भारत समेत सारी दुनिया ने अपनी आँखों से देखा है फिलहाल अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद इस मामले का पटाक्षेप हो जाना निश्चित प्रतीत हो रहा है।     मैंने इतिहास में पढ़ा था कि इस मस्जिद को बाबर के दीवान मीर बाकी ने 1527 ई0 में बनवाया था लेकिन यह मस्जिद...

तुम कितने गांधी मारोगे...

    मैं जानता हूं कि मेरे इस शीर्षक में कुछ लोग गलत अर्थ खोजेंगे लेकिन अर्थ निकालते समय वो ये भूल जाएंगे कि चाकू अगर किसी की जान ले सकता है तो बचा भी सकता है बस उसका उपयोग कौन क...